
दह-विह-धम्म-जुदाणं सहाव-दुग्गंध-असुइ-देहेसु
जं णिंदणं ण कीरइ णिव्विदिगिंछा गुणो सो हु ॥417॥
अन्वयार्थ : [दहविहधम्मजुदाणं] दस प्रकार के धर्म सहित [सहावदुग्गंधअसुइदेहेसु] मुनिराज का शरीर पहिले तो जो स्वभाव से ही दुर्गन्धित और अशुचि है और स्नानादि संस्कार के अभाव से बाह्य में विशेष अशुचि और दुर्गन्धित दिखाई देता है उसकी [जं णिंदणं ण कीरइ] जो निन्दा नहीं करना [सो हु णिव्विदिगिंछा गुणो] सो निर्विचिकित्सा गुण है।
छाबडा