
भय-लज्जा-लाहादो हिंसारंभो ण मण्णदे धम्मो
जो जिण-वयणेलीणो अमूढ-दिट्ठी हवे सो दु ॥418॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [भयलज्जालाहादो हिसारंभो धम्मो ण मण्णदे] भय, लज्जा और लाभ से हिंसा के आरम्भ को धर्म नहीं मानता है [जिणवयणे लीणो] और जिनवचनों में लीन है, [सो दु अमूढदिट्ठी हवे] उसके अमूढदृष्टिगुण है ।
छाबडा