+ उपगूहन गुण -
जो परदोसं गोवदि णिय-सुकयं जो ण पयासदे लोए
भवियव्वं -भावणरओ उवगूहण-कारओ सो हु ॥419॥
अन्वयार्थ : [जो परदोसं गोवदि] जो (सम्यग्दृष्टि) दूसरे के दोषों को छिपाता है, [णियसुकयं लोए जो ण पयासदे] अपने सुकृत (पुण्य) को लोक में प्रकाशित नहीं करता फिरता है [भवियव्वंभावणरओ] ऐसी भावनामें लीन रहता है कि जो भवितव्य है सो होता है तथा होगा [सो हु उवगृहणकारओ] सो उपगूहन गुण करनेवाला है ।

  छाबडा