
जो दस-भेयं धम्मं भव्व-जणाणं पयासदे विमलं
अप्पाणं पि पयासदि णाणेण पहावणा तस्स ॥422॥
अन्वयार्थ : [जो दसभेयं धम्म भव्वजणाणं] जो दस भेदरूप धर्म को भव्यजीवोंके निकट [णाणेण] अपने ज्ञान से [विमलं पयासदे] निर्मल प्रगट करे [अप्पाणं पि पयासदि] तथा अपनी आत्मा को दस प्रकार के धर्म से प्रकाशित करे [तस्स पहावणा] उसके प्रभावना गुण होता है ।
छाबडा