
जिण-सासण-माहप्पं बहु-विह-जुत्तीहि जो पयासेदि
तह तिव्वेण तवेण य पहावणा णिम्मला तस्स ॥423॥
अन्वयार्थ : [जो बहुविहजुत्तीहि] जो अपने ज्ञान के बलसे, अनेक प्रकार की युक्तियों से वादियों का निराकरण कर तथा न्याय व्याकरण छन्द अलंकार साहित्य विद्या से उपदेश वा शास्त्रों की रचना कर [तह तिव्वेण तवेण य] तथा अनेक अतिशय चमत्कार पूजा प्रतिष्ठा और महान् दुद्धर तपश्चरण से [जिणसासणमाहप्पं] जिनशासन के माहात्म्य को [पयासेदि] प्रगट करे [तस्स पहावणा णिम्मला] उसके प्रभावना गुण निर्मल होता है ।
छाबडा