जो ण कुणदि परतत्तिं पुणु पुणु भावेदि सुद्धमप्पाणं ।
इंदियसुहणिरवेक्खो णिस्संकाई गुणा तस्स ॥४२४॥
अन्वयार्थ : [जो परतत्तिं ण कुणदि] जो पुरुष दूसरों की निन्दा नहीं करता है [सुद्धमप्पाणं पुणु पुणु भावेदि] शुद्ध आत्मा को बार बार भाता (भावना करता) है [इंदियसुहणिरवेक्खो] और इन्द्रिय-सुख की अपेक्षा (वांछा) रहित होता है [तस्स णिस्संकाईगुणा] उसके निःशंकित आदि अष्ट गुण (अहिंसा धर्मरूप सम्यक्त्व) होता है ।

  छाबडा