णिस्संकापहुडिगुणा जह धम्मे तह य देवगुरुतच्चे ।
जाणेहि जिणमयादो सम्मत्तविसोहया एदे ॥४२५॥
अन्वयार्थ : [णिस्संकापहुडिगुणा जह धम्मे तह य देवगुरुतच्चे] ये निःशंकित आदि आठ गुण जैसे धर्म में प्रगट होते कहे गये हैं वैसे ही देव के स्वरूप में तथा गुरु के स्वरूप में (और षड्द्रव्य, पंचास्तिकाय, सप्त-तत्त्व, नव पदार्थों के स्वरूप में होते हैं) [जिणमयादो जाणेहि] इनको प्रवचन सिद्धान्त से जानना चाहिये [एदे सम्मतविसोहया] ये आठ गुण सम्यक्त्व को निरतिचार विशुद्ध करनेवाले हैं ।

  छाबडा