
जह जीवो कुणइ रइं, पुत्तकलत्तेसुकामभोगेसु ।
तह जह जिणिंदधम्मे, तो लीलाए सुहं लहदि ॥426॥
अन्वयार्थ : [जह जीवो पुत्तकलत्तेसुकामभोगेसु रइं कुणइ] जैसे यह जीव पुत्र-कलत्र में तथा काम-भोग में रति करता है [तह जइ जिणिंदधम्मे तो लीलाए सुहं लहदि] वैसे ही यदि जिनेन्द्र के वीतराग धर्म में करे तो लीलामात्र में ही सुख को प्राप्त हो जाय ।
छाबडा