+ लक्ष्‍मी का चाहना धर्म-बिना निष्फल -
लच्छिं वंछेइ णरो, णोव सुधम्‍मेसु आयरं कुणइ ।
बीएण विणा कत्‍थ वि, किं दीसदि सस्‍सणिप्‍पत्‍ती ॥427॥
अन्वयार्थ : [णरो लच्छिं वंछेइ] यह जीव लक्ष्‍मी को तो चाहता है [सुधम्‍मेसु आयरं णेव कुण्‍इ] और जिनभाषित धर्म में आदर (प्रीति) नहीं करता, [बीएण विणा सस्‍सणिप्‍पत्‍ती कत्‍थ वि किं दीसदि] बीज के बिना धान्‍य की उत्‍पत्ति क्‍या कहीं दिखाई देती है ?

  छाबडा