+ धर्मात्‍मा जीव की प्रवृत्ति -
जो धम्‍मत्‍थो जीवो, सो रिउवग्‍गे वि कुणदि खमभावं ।
ता परदव्‍वं वज्‍जह, जणणिसमं गणइ परदारं ॥428॥
अन्वयार्थ : [जो जीवो धम्‍मत्‍थो] जो जीव धर्म में स्थित है [सो रिउवग्‍गे वि खमभावे कुणदि] वह शत्रुओं के समूह पर भी क्षमा-भाव करता है [ता परदव्‍वं वज्‍ज्‍इ] दूसरे के द्रव्‍य को त्‍यागता है, [परदारं जणणिसमं गणइ] पर-स्‍त्री को माता के समान समझता है ।

  छाबडा