ता सव्‍वत्‍थ वि कित्‍ती, ता सव्‍वस्‍स वि हवेइ वीसासो ।
ता सव्‍वं पिय भासइ, ता शुद्धं माणसं कुणई ॥429॥
अन्वयार्थ : [ता सव्‍वत्‍थ वि कित्‍ती] (जो धर्म में स्थित है) उसकी सब लोक में कीर्ति होती है [ता सव्‍वस्‍स वि वीसासो हवेइ] उसका सब लोक विश्‍वास करता है [ता सव्‍वं पिय भासइ] वह पुरूष सबको प्रिय लगता है [ता सुद्धं माणसं कुणई] और वह पुरूष अपने तथा दूसरे के मन को शुद्ध (उज्‍जवल) करता है ।

  छाबडा