
उत्तमधम्मेण जुदो, होदि तिरक्खो वि उत्तमो देवो ।
चंडालो वि सुरिंदो, उत्तमधम्मेण संभवदि ॥430॥
अन्वयार्थ : [उत्तमधम्मेण जुदो तिरक्खो वि उत्तमो देवो होदि] उत्तम धर्म से युक्त तिर्यंच भी उत्तम देव होता है [उत्तमधम्मेण चंडालो वि सुरिंदो संभवदि] उत्तम धर्म से चांडाल भी देवेन्द्र हो सकता है ।
छाबडा