
अग्गी वि य होदि हिमं, होदि भुयंगो वि उत्तमं रयणं ।
जीवस्स सुधम्मादो, देवा वि य किंकरा होंति ॥431॥
अन्वयार्थ : [जीवस्स सुधम्मादो] जीव के उत्तम धर्म के प्रभाव से [अग्गी वि य हिमं होदि] अग्नि तो हिम हो जाती है [भुयंगो वि उत्तमं रयणं होदि] सांप भी उत्तम रत्नों की माला हो जाता है [देवा वि य किंकरा होंति] देव भी किंकर हो जाते हैं ।
छाबडा