अलियवयणं पि सच्‍चं, उज्‍जमरहिए वि लच्छिसंपत्‍ती ।
धम्‍मपहावेण णरो, अणओ वि सुहंकरो होदि ॥432॥
अन्वयार्थ : [धम्‍मपहावेण णरो] धर्म के प्रभाव से जीव के [अलियवयणं पि सच्‍चं] असत्य-वचन भी सत्‍य हो जाते हैं [उज्‍जमरहिउ वि लच्छिसंपत्‍ती] उद्यम-रहित को भी लक्ष्‍मी की प्राप्ति हो जाती है [अणओ वि सुहंकरो होदि] और अन्‍यान्‍य-कार्य भी सुख के करने वाले हो जाते हैं ।

  छाबडा