
देवो वि धम्मचत्तो, मिच्छत्तवसेण तस्वरो होदि ।
चक्की वि धम्मरहिओ, णिवडइ णरए ण संदेहो ॥433॥
अन्वयार्थ : [धम्मचत्तो मिच्छत्तवसेण देवो वि तरूवरो होदि] धर्म-रहित मिथ्यात्व के वश से देव भी वनस्पतिकायिक एकेन्द्रिय जीव हो जाता है [धम्मरहिओ चक्की वि णरए णिवडइ] धर्म-रहित चर्कवर्ती भी नरक में जा पडता है [ण संदेहो] उसमें भी कोई सन्देह नहीं है ।
छाबडा