धम्‍मविहीणो जीवो, कुणइ असक्‍कं पि साहसं जइ वि ।
तो ण वि पावदि इट्ठं, सुट्ठु अणिट्ठं परं लहदि ॥434॥
अन्वयार्थ : [धम्‍मविहीणो जीवो जइ वि असक्‍कं साहसं पि कुणइ] धर्म-रहित जीव यद्यपि बड़ा असह्य साहस (पराक्रम) भी करता है [तो इट्ठं सट्ठु ण वि पावदि] तो भी उसको इष्‍ट वस्‍तु की प्राप्ति नहीं होती है [परं अणिट्ठं लहदि] केवल अनिष्‍ट की प्राप्ति होती है ।

  छाबडा