इय पच्‍चक्‍खं पेच्‍छह धम्‍माहम्‍माण विविहमाहप्‍पं ।
धम्‍मं आयरह सया, पावं दूरेण परिहरह ॥435॥
अन्वयार्थ : [इय धम्‍माहम्‍माण विविहमाहप्‍पं पच्‍चक्‍खं पेच्‍छह] इस प्रकार से धर्म और अधर्म का अनेक प्रकार का माहात्‍म्‍य प्रत्‍यक्ष देखकर [सया धम्‍मं आयरह] तुम सदा धर्म का आदर करो [पावं दूरेण परिहरह] और पाप को दूर ही से छोड़ो ।

  छाबडा