
उवसमणं अक्खाणं, उववामो वण्णिदो मुणिंदेहि ।
तम्हा भुंजुंताविय जिदिंदिया हों ति उववासा ॥437॥
अन्वयार्थ : [मुणिंदेहि अक्खाणं उवसमणं उववासा वण्णिदो] मुनीन्दों ने संक्षेप में इन्दियों को विषयों में न जाने देने को, मन को अपने आतम-स्वरूप में लगाने को उपवास कहा है [तम्हा जिदिंदिया भुंजुंता वि य उववासा होंति] इसलिये जितेन्द्रिय आहार करते हुए भी उपवास सहित ही होते हैं ।
छाबडा