
जो मणइंदियविजई, इहभवपरलोयसोक्खणिरवेक्खो ।
अप्पाणे विय णिवसइ, सज्झायपरायणो होदि ॥438॥
कम्माणणिज्जरट्ठं, आहारं परिहरेइ लीलाए ।
एगदिणादिपमाणां, तस्स तवं अणसणं होदि ॥439॥
अन्वयार्थ : [जो मणइंदियविजई] जो मन और इन्द्रियों को जीतनेवाला है [इह भवपरलोयसोक्खणिरवेक्खो] इस भव और परभव के विषय-सुखों में अपेक्षा-रहित है [अप्पाणे विय णिवसइ] अपने आत्म-स्वरूप में ही रहता है [सज्झायपरायणो होदि] तथा स्वाध्याय में तत्पर है । [एगदिणादिपमाणं] और एक दिन की मर्यादा से [कम्माण णिज्जरट्ठ] कर्मों की निर्जरा के लिये [लीलाए आहारं परिहरेइ] लीलामात्र ही क्लेश-रहित हर्ष से आहार को छोड़ता है [तस्स अणसणं तवं होदि] उसके अनशन तप होता है ।
छाबडा