उववासं कुव्‍वाणो, आरंभं जो करेदि मोहादो ।
तस्‍स किलेसो अवरं, कम्‍माणं णेव णिज्‍जरणं ॥440॥
अन्वयार्थ : [जो उववासं कुव्‍वाणे मोहादो आरंभं करेदि] जो उपवास करता हुआ मोह से आरम्‍भ (गृहकार्यादि) को करता है [तस्‍स अवरं किलेसो] उसके अधिक क्‍लेश हो गया [कम्‍माणं णिज्‍जरणं णेव] कर्मों का निर्जरण तो नहीं हुआ ।

  छाबडा