+ अवमौदर्य तप -
आहारगिद्धिरहिओ, चरियामग्‍गेण पासुगं जोग्‍गं ।
अप्‍पयरं जो भुज्‍जइ, अवमोदरियं तवं तस्‍स ॥441॥
अन्वयार्थ : [जो आहारगिद्धिरहिओ] जो तपस्‍वी आहार की अतिचाह से रहित होकर [चरियामग्‍गेण जोग्‍गं पासुगं] शास्‍त्रोक्‍त चर्या की विधि से योग्‍य प्रासुक आहार [अप्‍पयरं भुंजइ] अति अल्‍प लेता है [तस्‍स अवमोदरियं तवं] उसके अवमौदर्य तप होता है ।

  छाबडा