
जो पुण कित्तिणिमित्तं, मायाए मिट्ठभिक्ख्लाहट्ठं ।
अप्पं भुज्जदि भोज्जं, तस्स तवं णिप्फलं बिदियं ॥442॥
अन्वयार्थ : [जो पुण कित्तिणिमित्तं] जो मुनि कीर्ति के निमित्त तथा [मायाए मिट्ठभिक्खलाहट्ठं] माया से और मिष्ट-भोजन के लाभ के लिए [अप्पं भोज्जे भुंजदि] अल्प-भोजन करता हे [तस्स विदियं तवं णिप्फलं] उसके दूसरा अवमौदर्य तप निष्फल है ।
छाबडा