
संसारदुक्खतट्ठो, विससमविसयं विचिंतमाणो जो ।
णीरसभोज्जं भुंजइ, रसचाओ तस्स सुविसुद्धो ॥444॥
अन्वयार्थ : [जो संसारदुक्खतट्ठो विससमवियं विचिंतमाणो] जो मुनि संसार के दु:ख से तप्तायमान होकर ऐसे विचार करता है कि इन्द्रियों के विषय षिसमान हैं विष खाने पर तो एक ही बार मरता है और विषय-सेवन करने पर बहुत जन्म मरण होते हैं ऐसा विचार कर [णीरसभोज्जं भुंजइ] नीरस भोजन करता है [तस्स रसचाओ सुविसुद्धो] उसके रस-परित्याग तप निर्मल होता है ।
छाबडा