
जो रायदोसहेदू आसणसिज्जादियं परिच्चयइ ।
अप्पा णिव्विसय सया, तस्स तवो पंचमो परमो ॥445॥
अन्वयार्थ : [जो रायदोसहेदू आसणसिज्जादियं परिच्चयइ] जो राग-द्वेष का कारण, आसन शय्या आदि, को छोड़ता है [अव्वा णिव्विसय सया] तथा सदा अपने आत्म-स्वरूप में रहता है [तस्स पंचमो तवो परमो] उस मुनि के पांचवा तप विविक्त-शय्यासन उत्कृष्ट होता है ।
छाबडा