पूजादिसु णिरवेक्‍खो, संसारसरीरभोगणिव्विण्‍णो ।
अब्‍भंतरतवकुसलो, उवसमसीलो महासंतो ॥446॥
जो णिवसेदि मसाणे, वणगहणे णिज्‍जणे महाभीमे ।
अण्‍णत्‍थ वि एयंते, तस्‍स वि एदं वि एदं तवं होदि ॥447॥
अन्वयार्थ : [जो पूजादिसु णिरवेक्‍खो] जो पूजा आदि में निरपेक्ष है, [संसारसरीरभोगणिव्विण्‍णो] संसार, शरीर और भोगों से विरक्‍त है [अब्‍भंतरतवकुसलो] (स्‍वाध्‍याय, ध्‍यान आदि) अन्‍तरंग तपों में प्रवीण है, [उवसमसीलो] उपशमशील (मन्‍दकषायरूप शान्‍तपरिणामी) है [महासंतो] महा पराक्रमी है । [मसाणे वणगहणे णिज्‍जणे महाभीमे अण्णत्‍थ वि एयंते णिवसेदि] श्‍मशानभूमि, गहन-वन, निर्जन-स्‍थान, महा-भयानक उद्यान और अन्‍य भी ऐसे एकान्‍त स्‍थानों में रहता है [तस्‍स वि एदं विं होदि] उसके निश्‍चय से यह विविक्‍त-शय्यासन तप होता है ।

  छाबडा