
दोसं ण करेदि सयं, अण्णं पि णकारएदि जो तिपिहं ।
कुव्वाणं पि ण इच्छदि, तस्स विसोही परा होदि ॥449॥
अन्वयार्थ : [जो तिविहं सयं दोसं ण करेदि अण्णं पि णकारएदि] जो मन-वचन-काय से स्वयं दोष नहीं करता है, दूसरे से भी दोष नहीं कराता है और [कुव्वाणं पिण इच्छदि] करते हुए को भी अच्छा नहीं मानता है [तस्स परा विसोही होदि] उसके उत्कृष्ट विशुद्धि होती है ।
छाबडा