
जं किं पि तेण दिण्णं, तं सव्वं सो करेदि सद्धाए ।
णो पुण हियएसेकदि, किं थोवं किं पि वहुयं वा ॥451॥
अन्वयार्थ : [जं किं पि तेण दिण्णं तं सव्वं सो सद्धाए करेदि] दोषों की आलोचना करने के बाद में जो कुछ आचार्य ने प्रायश्चित्त दिया हो उस सब ही को श्रद्धापूर्वक करे [पुण हियए णोसेकदि किं थोवं किंमु वहुयं वा] और ह्रदय में ऐसी शंका न करे कि यह प्रायश्चित्त दिया सो थोड़ा है या बहुत है ।
छाबडा