पुणरविकाउं णेच्‍छदि, तं दोसं जइ वि जाइ सयखंडं ।
एवं णिच्‍चयसहिदो, पायच्छित्‍तं तवो होदि ॥452॥
अन्वयार्थ : [पुणरवि तं दोसंकाउं णेच्‍छदि जइ वि सयखंडं जाइ] लगे हुए दोष का प्रायश्चित्‍त लेकर उस दोष को करना न चाहे, यदि अपने सौ टुकड़े भी हो जाय तो भी न करे [एवं णिच्‍चयसहिदो पायच्छित्‍तं तवो होदि] ऐसे निश्‍चय सहित प्रायश्चित्‍त नामक तप होता है ।

  छाबडा