
जो चिंतइ अप्पाणं, णाणसरूवं पुणो पुणो णाणी ।
विकहादिविरत्तमणो, पायच्छित्तं वरं तस्स ॥453॥
अन्वयार्थ : [जो णाणी अप्पाणं णाणसरूवं पुणो पुणो चिंतइ] जो ज्ञानी आत्मा को ज्ञान-स्वरूप बारम्बार चिंतवन करता है [विकहादिविरत्तमणो] और विकथादिक प्रमादों से विरक्त होता हुआ ज्ञान ही का निरन्तर सेवन करता है [तस्स वरं पायच्छित्तं] उसके श्रेष्ठ प्रायश्चित्त होता है ।
छाबडा