दंसणणाणचरित्‍ते, सुविसुद्धो जो इवेइ परिणामो ।
वारसभेदे वि तवे, सो च्चिय विणओ हवे तेसिं ॥455॥
अन्वयार्थ : [दंसणणाणचरित्‍ते] दर्शन-ज्ञान-चारित्र में [वारसभेदे वि तवे] और बारह प्रकार के तप में [जो सूविसूद्धो परिणामोहवेइ] जो विशुद्ध परिणाम होते हैं [सो च्चिय तेसिं विणओ हवे] वह ही उनका विनय है ।

  छाबडा