
रयण्णत्तयजुत्ताणं, अणुकूलं जो चरेदि भत्तीए ।
भिच्चो जह रायाणं, उवयारो सो हवे विणओ ॥456॥
अन्वयार्थ : [जह रायाणं भिच्चो] जैसे राजा के नौकर राजा के अनुकूल प्रवृत्ति करते हैं वैसे ही [जो रयण्णत्तयजुत्ताणं अणुकूलं भत्तीए चरेदि] जो रत्नत्रय के धारक मुनियों के अनुकूल भक्ति पूर्वक आचरण करता है [सो उवयारो विणओ हवे] सो उपचार विनय है ।
छाबडा