+ वैयावृत्‍य तप -
जो उवयरदि जदीणं, उवसग्‍गजराइखीणकायाणं ।
पूजादिसु णिारवेक्‍खं , वेज्‍जावच्‍चं तवो तस्‍स ॥457॥
अन्वयार्थ : [जो पूजादिसु णिरवेक्‍खं] जो अपनी पूजा (महिमा) आदि में अपेक्षा (वांछा) रहित होकर [उवसग्‍गजराइखीणकायाणं जदीणं उवयरदि] उपसर्ग पीडित तथा जरा रोगादि से क्षीणकाय यतियों का अपनी चेष्‍टा से, उपदेश से और अल्‍प वस्‍तु से उपकार करता है [तस्‍स वेज्‍जावच्‍चं तवो] उसके वैयावृत्‍य नामक तप होता है।

  छाबडा