
जो वावरइ सरूवे, समदम भावम्मि सुद्धिउवजुत्तो ।
लोयववहारविरदो, वेज्जावच्चं परं तस्स ॥458॥
अन्वयार्थ : [जो समदम भावम्मि वावरइ सरूवे सुद्धिउवजुत्तो] जो शमदम भावरूप अपने आत्म-स्वरूप में शुद्धोपयोगमय प्रवृत्ति करता है और [लोयववहारविरदो] लोक-व्यवहार से विरक्त होता है [तस्स परं वेज्जावच्चं] उसके उत्कृष्ट वैयावृत्य होता है ।
छाबडा