
परतत्तीणिरवेक्खो, दुट्ठवियप्पाण णासणसमत्थो ।
तच्चविणिच्छयहेदू, सज्झाओ ज्झणसिद्धियरो ॥459॥
अन्वयार्थ : [परतत्तीणिरवेक्खो] दूसरे की निन्दा में निरपेक्ष, [दुट्ठवियप्पाण णासणसमत्थो] मन के दुष्ट विकल्पों का नाश करने में समर्थवान के, [तच्चविणिच्छयहेदू] तत्व के निश्चय करने का कारण और [ज्झणसिद्धियरो] ध्यान की सिद्धि करने वाला [सज्झाओ] स्वाध्याय नामक तप हेाता है ।
छाबडा