
पूयादिसु णिरवेक्खो, जिणसत्थं जो पढेइ भत्तीए ।
कम्मलसोहणट्ठं, सुयनलाहो सुहयरो तस्स ॥460॥
अन्वयार्थ : [जो पूयादिसु णिरवेक्खो] जो अपनी पूजा आदि में निरपेक्ष होता है और [कम्मलसोहणट्ठं] कर्मरूपी मैल का नाश करनेके लिए [भत्तीए जिणसत्थं पढेइ] भक्ति-पूर्वक जिन-शास्त्र को पढ़ता है [तस्स सुयनलाहो सुहयरो] उसको श्रुत का सुखकारी लाभ होता है ।
छाबडा