
जो जिणसत्थंसेवदि, पंडियमाणी फलं समीहंतो ।
साहम्मियपडिकूलो, सत्थं पि विसं हवे तस्स ॥461॥
अन्वयार्थ : [जो जिणसत्थंसेवदि फलं समीहंतो] जो जिनशास्त्र तो पढ़कर फल को चाहता है [साहम्मियपडिकूलो] तथा साधर्मी के प्रतिकूल है [पंडियमाणी] सो पंडितमन्य है [तस्स सत्थं पि विसं हवे] उसके वह ही शास्त्र विषरूप होता है ।
छाबडा