
जो अप्पाणं जाणदि, असुइसरीरादुतच्चदो भिण्णं ।
जाणगरूवसरूवं, सो सत्थं जाणदे सव्वं ॥463॥
अन्वयार्थ : [जो अप्पाणं असुइसरीरादु तच्चदो भिण्णं] जो अपनी आत्मा को इस अपवित्र शरीर से भिन्न [जाण्गरूवसरूवं जाणदि] ज्ञायकरूप स्वरूप जानता है [सो सव्वं सत्थं जाणदे] वह सब शास्त्रों को जानता है ।
छाबडा