जो णवि जाणदि अप्‍पं, णाणसरूवं सरीरदोभिण्‍णं ।
सो णवि जाणदि सत्‍थं, आगमपाढं पुणंतो वि ॥464॥
अन्वयार्थ : [जो अप्‍पं णाणसरूवं सरीरदो भिण्‍णं णवि जाणदि] जो अपनी आत्‍मा को ज्ञानस्‍वरूपी और शरीर से भिन्‍न नहीं जानता है [सो आगमपाढं कुणंतो वि सत्‍थं णवि जाणदि] सो आगम का पाठ करे तो भी शास्‍त्र को नहीं जानता है ।

  छाबडा