+ व्‍युत्‍सर्ग तप -
जल्‍लमललित्‍तगत्‍तो, दुस्‍सहवाहीसु णिप्‍पडीयारो ।
मुहधोवणादिविरओ, भोयणसेज्‍जादिणिरवेक्‍खो ॥465॥
ससरूवचिंतणरओ, दुज्‍जणसुयणाण जो हु मज्‍झत्थो ।
देहे वि णिम्‍ममत्‍तो,काओसग्‍गो तवो तस्‍स ॥466॥
अन्वयार्थ : [जो जल्‍लमललित्‍तगत्‍तो] जो जल्‍ल (पसेव) और मल से तो लिप्‍त शरीर हो [दुस्‍सहवाहीसु णिप्‍पडीयारो] असह्य तीव्र रोग आने पर भी उसका प्रतीकार (इलाज) न करता हो [मुहधोवणादिविरओ] मुँह धोना आदि शरीर के संस्‍कार से विरक्‍त हो [भोयणसेज्‍जादिणिरवेक्‍खो] भोजन और शय्या आदि की वांछा रहित हो [ससरूवचिंतणरओ] अपने स्‍वरूप के चिंतवन में रत (लीन) हो [दुज्‍जणसुयणाण हु मज्‍झत्‍थो] दुजैन सज्‍जन में मध्‍यस्‍थ हो (शत्रु मित्र बराबर जानता हो) [देहे विणिम्‍ममत्‍तो] अधिक क्‍या कहें, देह में भी ममत्‍व-रहित हो [तस्‍सकाओसग्‍गो तवो] उसके कायोत्‍सर्ग नामक तप होता है ।

  छाबडा