
अंतो मुहुत्तमेत्तं, लीणं वत्थुम्मि माणसं णाणं ।
ज्झाणं भण्णदि समए, असुहं च सुहं च तं दुविहं ॥468॥
अन्वयार्थ : [माणसं णाणं वत्थुम्मि अन्त्तो मुहुत्तमेत्तं लीणं] जो मन सम्बन्धी ज्ञान वस्तु में अन्तर्मुहूर्तमात्र लीन होता है सो [समए ज्झाणं भण्णदि] सिद्धांत में ध्यान कहा गया है [तं च असुहं सुहं च दुविहं] और वह शुभ अशुभ के भेद से दो प्रकार का है ।
छाबडा