
असुहं अट्ट रउद्दं, धम्मं सुक्कं च सुहयरं होदि ।
अट्टं तिव्वकषायं, तिव्वतमकसायदो रूद्दं ॥469॥
अन्वयार्थ : [अट्ट रउद्दं असुहं] आर्त-ध्यान रौद्र-ध्यान ये दोनों तो अशुभ ध्यान है [धम्मं सुक्कं च सुहयरं होदि] और धर्म-ध्यान शुक्ल-ध्यान ये दोनों शुभ और शुभतर हैं [अट्टं तिव्वकषायं] इनमें आदि का आर्तध्यान तो तीव्र कषाय से होता है [रूद्दं तिव्वतमकसायदो] और रौद्रध्यान अति तीव्र कषाय से होता है ।
छाबडा