
मंदकषायं धम्मं, मंदतमकसायदो अवे सुक्कं ।
अकसाए वि सुयड्ढे,केवलणाणे वि तं होदि ॥470॥
अन्वयार्थ : [धम्मं मंदकषायं] धर्म-ध्यान मन्द-कषाय से होता है [सुक्कं मंदतमकसायदो अवे] शुक्ल-ध्यान अत्यन्त मन्द-कषाय में होता है, [अकसाए वि सुयड्ढेकेवलणाणे वि तं होदि] और वह शुक्ल-ध्यान कषाय का अभाव होने पर श्रुतज्ञानी, उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय, केवलज्ञानी, सयोगी तथा अयोगी जिन के भी होता है ।
छाबडा