+ आर्त-ध्‍यान -
दुक्‍खयर-विसयजोए,केम इमं चयदि इदि विचिंतंतो ।
चेट्ठदि जो विक्खित्‍तो, अट्टंज्‍झाणं हवे तस्‍स ॥471॥
मणहरविसयविओगे, कह तं पावेमि इहि वियप्‍पो जो ।
संतावेण पयट्टो, सो च्चिय अट्टं हवे ज्‍झाणं ॥472॥
अन्वयार्थ : [जो दुक्‍खयरविसयजोए] जो दु:खकारी विषय का संयोग होने पर [इदि विचिंतंतो] ऐसा चिन्‍तवन करे कि [इमंकेम चयदि] यह मेरे कैसे दूर हो, [विक्खित्‍तो चेट्ठदि] विक्षिप्‍त-चित्‍त होकर चेष्‍टा करे, [तस्‍स अट्टं ज्‍झाणं हवे] उसके आर्त्‍त-ध्‍यान होता है [जो मणहरविसयविओगे] जो मनोहर विषय सामग्री का वियोग होने पर [इदि वियप्‍पो] ऐसा चिंतवन करे कि [तं कह पावेमि] उसको मैं कैसे पाउँ [संतावेण पयट्टो] उसके वियोग से संतापरूप [दु:खस्‍वरूप] प्रवृत्ति करे [सो च्चिय अट्टं ज्‍झाणं हवे] वह भी आर्त-ध्‍यान है ।

  छाबडा