
हिंसाणंदेण जदो, असच्चवयणेण परिणदो जो दु ।
तत्थेव अथिरचित्तो, रूद्दं ज्झाणं हवे तस्स ॥473॥
अन्वयार्थ : [जो हिंसाणंदेण जुदो] जो हिंसा में आनन्द युक्त होता है, [असच्चपयणेण परिणदो दु] असत्य-वचन से प्रवृत्ति करता रहता है [तत्थेव अथिरचित्तो] और इन्हीं में विक्षिप्त-चित्त बना रहता है [तस्स रूद्दं जझाणं हवे] उसके रौद्र-ध्यान होता है ।
छाबडा