परविसयहरणसीलो, सगीयविसये सुरक्‍खणेदक्खो ।
तग्‍गयचिंत्‍तविट्ठो, णिरंतरं तं पि रूद्दं पि ॥474॥
अन्वयार्थ : [परविसयहरणसीलो] जो दूसरे की विषय-सामग्री को हरण करने के स्‍वभाव सहित हो [सगीयविसये सुरक्‍खणे दक्‍खो] अपनी विषय-सामग्री की रक्षा करने में प्रवीण हो [तग्‍गयचिंत्‍ताविट्ठो णिरंतरं] इन दोनों कार्यों में निरन्‍तर चित्‍त को लवलीन रखता हो [तं पि रूद्दं पि] उसके भी रौद्र-ध्‍यान ही है ।

  छाबडा