+ हेय-उपादेय ध्यान -
विण्णि वि असुहेज्‍झणे, पावणिहाणे य दुक्‍खसंताणे ।
तम्‍हा दूरे वज्‍जह, धम्‍मे पुण आयरं कुणह ॥475॥
अन्वयार्थ : [विण्णि विज्‍झाणे असुहे] (आर्त और रौद्र) दोनों ही अशुभ-ध्‍यान को [पावणिहाणे य दुक्‍खसंताणे] पाप के निधान और दु:ख की सन्‍तान [तम्‍हा दूरे वज्‍जह] जानकर दूर ही से छोड़ो [पुण धम्‍मे आयरं कुणह] और धर्म-ध्‍यान में आदर करो ।

  छाबडा