धम्‍मे एयग्‍गमणो, जो ण वि वेदेदि पंचहा विसयं ।
वेरग्‍गमओ णाणी, धम्‍मज्‍झणं हवे तस्‍स ॥477॥
अन्वयार्थ : [जो णाणी] जो ज्ञानी [धम्‍मे एयग्‍गमणो] धर्म में एकाग्र मन हो प्रवर्ते [पचहा विसयं ण वि वेदेदि] पाँचों इन्द्रियों के विषयों को नहीं वेदे [वेरग्‍गमओ] और वैराग्‍यमयी हो [तस्‍स ध्‍म्‍मज्‍झाणं हवे] उसके धर्म-ध्‍यान होता है ।

  छाबडा