सुविसुद्धरायदोसो, बाहिरसंकप्‍पवज्जिओ धीरो ।
एयग्‍गमणो संतो, जं चिंतइ तं पि सुहज्‍झाणं ॥478॥
अन्वयार्थ : [सुविसुद्धरायदोसो] जो राग-द्वेष से रहित होता हुआ [बाहिरसंमप्‍पवज्जिओ धीरो] बा‍ह्य के संकल्‍प से वर्जित होकर, धीर-चित्‍त, [एयग्‍गमणो संतो जं चिंतइ] एकाग्रमन होता हुआ जो चिन्‍तवन करे [तं पि सुहज्‍झाणं] वह भी शुभ-ध्‍यान है ।

  छाबडा