
ससरूवसमुब्भासो, णट्ठममत्तो जिदिंदिओ संतो ।
अप्पाणं चिंतंतो, सुहज्झाणरओ हवे साहू ॥479॥
अन्वयार्थ : [ससरूवसमुब्भासो] अपने स्वरूप का समुद्भास हो गया हो [णट्ठममत्तो ज] ममत्व-भाव जिसका नष्ट हो गया हो [जिदिंदिओ संतो] जितेन्द्रिय हो [अप्पाणं चिंतंतो] और अपनी आत्मा का चिन्तवन करता हो [साहू सुहज्झाणरओ हवे] वह साधु शुभ-ध्यान में लीन होता है ।
छाबडा