
जत्थ गुणा सुविसुद्धा, उवसमखमणं च जत्थ कम्माणं ।
लेसा वि जत्थ सुक्का, तं सुक्कं भण्णदे ज्झाणं ॥481॥
अन्वयार्थ : [जत्थ सुविसुद्धा गुणा] जहाँ भले प्रकार विशुद्ध उज्जवल गुण हों [जत्थ कम्माणं उवसमखमणं च] जहाँ कर्मों का उपशम तथा क्षय हो [जत्थ लेसा वि सुक्का] और जहाँ लेश्या भी शुक्ल ही हो [तं सुक्कं ज्झाणं भण्णदे] उसको शुक्ल-ध्यान कहते हैं ।
छाबडा